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Tuesday, August 17, 2010

KYA MILA MUJHE..

क्या मिला मुझे?
ये रिश्तों का संसार
कुछ द्वेष कुछ अहंकार
आरोप,प्रत्यारोप और ये घृणित संसार
नफरत अन्याय के ये ओछे विचार
स्वाभिमान, सम्मान सब धरा रह गया
त्याग,स्नेह और ज्ञान सब पड़ा रह गया
अश्रु बहा कर देखा निचोड़ा एहसाश को
ना किया किनारे कभी सुख को,विलास को
पाया कुछ नहीं सिर्फ खोया है हमने
भागते भागते अब साँसे भी लगी हैं थमने
मोह के जाल ने ना जीने दिया ना मरने
दिल में छुपे दर्द से अब हम भी लगे हैं डरने
मिला है अपनों से ही दुत्कार
दुनिया में सीमित होकर सिमटा है प्यार
जीने का आधार नहीं,उल्लाश नहीं,विश्वास  नहीं
तो क्या मिला मुझे
क्या मिला मुझे?

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