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Tuesday, August 17, 2010

KYA MILA MUJHE..

क्या मिला मुझे?
ये रिश्तों का संसार
कुछ द्वेष कुछ अहंकार
आरोप,प्रत्यारोप और ये घृणित संसार
नफरत अन्याय के ये ओछे विचार
स्वाभिमान, सम्मान सब धरा रह गया
त्याग,स्नेह और ज्ञान सब पड़ा रह गया
अश्रु बहा कर देखा निचोड़ा एहसाश को
ना किया किनारे कभी सुख को,विलास को
पाया कुछ नहीं सिर्फ खोया है हमने
भागते भागते अब साँसे भी लगी हैं थमने
मोह के जाल ने ना जीने दिया ना मरने
दिल में छुपे दर्द से अब हम भी लगे हैं डरने
मिला है अपनों से ही दुत्कार
दुनिया में सीमित होकर सिमटा है प्यार
जीने का आधार नहीं,उल्लाश नहीं,विश्वास  नहीं
तो क्या मिला मुझे
क्या मिला मुझे?

Thursday, August 12, 2010

CHAAHAT

कुछ नहीं मेरा सब कुछ तेरी एक  हसी के आगे
चाहूँगा तुम्हे हर एक सदी के आगे
है कवित पर सच हैं  कामनाएं मिट नहीं सकती
समर्पण के बोझ तलें इक्षाएं झुक नहीं सकती
जो अब न कहा तो कह ना सकूँगा
तुझसे जुदा होकर रह न सकूँगा
सोचा न था इतना चाहूँगा तुझे
कवी अपो में व् गिन पायूँगा तुझे
अब दर लगता है तुझे देखे बिना मर न जाऊ कहीं
तेरी यादो के साए में खो ना जाऊ कही
तेरी हसी ही दुआ है मेरी खुदा के आगे
कुछ नहीं मेरा सब कुछ तेरी एक हसी के आगे

Tuesday, August 10, 2010

MANN































मन को अविरल बहने दो




मन को अविरल बहने दो
झील की चोटिल लहरों से निदिस्त पवन से लरने दो
अपार प्राकृतिक विकल्पों सी 
परमार्थ प्रासंगिक दुनिया में सब मुक्ति से रहने दो 
पथरीली संमर्गों पर दिशा मलिन कुछ अनजानी सी 
विक्षिप्त आंशिक बाधाओं को विलीन वही हो जाने दो 
अनल की तेज,प्रखर छाया सी 
मन को अविरल बहने दो 
काल्पनिक सपनो की भवसागर सी
साकार सब हो जाने दो 
प्रत्यक्ष मिलन की अभेद छितिज सी 
पर्याय विधित हो जाने दो 
विरह की करुण  निरमं व्यथा सी 
वैदिक वाणी सत्य हो जाने दो
इश्वरिये अभिन्न इश दुनिया सी
प्रभुत्व बोध मिट जाने दो
मातृत्व समन्वय आँचल सी
मन को अविरल बहने दो
विनीत शिशु की मनोहारी किलकारी सी
उन्मादित जग हो जाने दो
रेगिस्ता की शुष्क पवन सी
विहर विराने मन में भी स्नेह सलिल भर जाने दो....

पता नहीं कैसे??

तुम्हारे पास आना चाहता हूँ
अपनी बाहों में भर लेना चाहता हूँ
शब्द रहित कुछ कह चाहता हूँ
पर पता नहीं कैसे?
तुम्हे पा लेना चाहता हूँ
जीवन की डोर में समां लेना चाहता हूँ
तुम्हे अपना बना लेना चाहता हूँ
पर पता नहीं कैसे?
तुमसे सिमट कर अपनी रूह को पनाह देना चाहता हूँ
तुम्हे खुद में छुपा लेना चाहता हूँ
तुम में ही अपनी छोटी सी दुनिया बसा लेना चाहता हूँ
पर पता नहीं कैसे?
तेरे सपनो को साकार बना देना चाहता हूँ
निह्शांत मन को तृष्णा दिलदेना चाहता हूँ
आशाओं की नयी भाषा रचा देना चाहता हूँ
पर पता नहीं कैसे?
तुम्हे भगवन से भी ऊपर बिठा देना चाहता हूँ
तेरी पूजा में खुद को लुटा देना चाहता हूँ
समर्पण को सृजन से झुका देना चाहता हूँ
पर पता नहीं कैसे?
अपने जीवन का हर एक पल देना चाहता हूँ
तेरी झोली को खुशियों से भर देना चाहता हूँ
प्रबल अपने तक़दीर को बदल देना चाहता हूँ
पर पता नहीं कैसे?
तेरा साथ न छोरु कभी ऐसा एक प्रण लेना चाहता हूँ
जीवन की रिक्ति को भर लेना चाहता हूँ
तेरे साथ जीने को कई जन्म लेना चाहता हूँ
पर पता नहीं कैसे?
उलझनों से मुक्त करा सेना चाहता हूँ
आज़ादी की भावना जगा देना चाहता हूँ
सबों से तुम्हे चुरा लेना चाहता हूँ
पर पता नहीं कैसे?
शासक तुम्हे बना देना चाहता हूँ
सबकी हित चढ़ा देना चाहता हूँ
पर पता नहीं कैसे?
तुम्हे ना चाहे उन्हें सजा देना चाहता हूँ 
तेरे हित में खुद को मिटा देना चाहता हूँ 
अस्थियों को तुझसे अर्पण करा देना चाहता हूँ
पर पता नहीं कैसे?
धन्य मैं खुद को बना लेना चाहता हूँ
जन्मों का साथी कहा लेना चाहता हूँ
इन सब उमीदों  में नहीं, सच में जी लेना चाहता हूँ
पर पता नहीं कैसे?