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Tuesday, August 10, 2010

MANN































मन को अविरल बहने दो




मन को अविरल बहने दो
झील की चोटिल लहरों से निदिस्त पवन से लरने दो
अपार प्राकृतिक विकल्पों सी 
परमार्थ प्रासंगिक दुनिया में सब मुक्ति से रहने दो 
पथरीली संमर्गों पर दिशा मलिन कुछ अनजानी सी 
विक्षिप्त आंशिक बाधाओं को विलीन वही हो जाने दो 
अनल की तेज,प्रखर छाया सी 
मन को अविरल बहने दो 
काल्पनिक सपनो की भवसागर सी
साकार सब हो जाने दो 
प्रत्यक्ष मिलन की अभेद छितिज सी 
पर्याय विधित हो जाने दो 
विरह की करुण  निरमं व्यथा सी 
वैदिक वाणी सत्य हो जाने दो
इश्वरिये अभिन्न इश दुनिया सी
प्रभुत्व बोध मिट जाने दो
मातृत्व समन्वय आँचल सी
मन को अविरल बहने दो
विनीत शिशु की मनोहारी किलकारी सी
उन्मादित जग हो जाने दो
रेगिस्ता की शुष्क पवन सी
विहर विराने मन में भी स्नेह सलिल भर जाने दो....