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Sunday, December 4, 2016

''सर्वार्थ ''..

       ''सर्वार्थ ''.. 



सब के साथ खुद की बात 

गुजरे दिन और रात 

 मिले कितनो से हाथ 

 हर्ष और रंज के जज़्बात 

देखे करिश्में और करामात 

सार्थक हुए हर हालात 

बीते पल और लम्हों के गाँठ 

खाया कभी माँ से डाट 

बाबूजी का बीच बचाओ, माँ कहती इश्को पक्षपात 

उम्र ढली सीख प्रपंच , रंजिश की कभी सौगात 

मानो ईश होर में छाये सभी नए सब्दार्थ 

रास्ते बदले , आयाम बदली 

दृष्टिगोचर परिहार्थ 

समय मिथ्या और ठहराओ 

दिखाई अपनी औकाद 

मिल गया है लगता मुझको जीवन के अर्थ का सिद्धार्थ 

जैसे हो प्रखर प्रवृति और परोपकार 

हो प्रफुलित मनन के नाथ 

मैं समझ मूल्य इनका ,

 यही तो हैं सर्वार्थ.,




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