व्यथा ..
हर जलन को मशाल करते रहो..
आहटों से सवाल करते रहो
बेरुखी से मर ना जाए कोई
आदमी का ख़याल करते रहो
क्यों ज़िन्दगी के भाव हर लब्ज़ कहते हो
हमनें तो दे दिया लहू के हर निचोड़ को
कैसे होगा विकास के आज भी किसान वो
रहता है ताकत आसमान को
मैं चला , धरा चली, रुक गया , बसी गली..
शाम को दिया जला , भोर को हँसी काली
आयु का दूत लिए , वायु पर सवार हूँ
पञ्च तत्त्व से बना प्यार का सितार हूँ
जीवन की गरिमा है अब भी कैसे चेतु
जो जंग लगी उसको खराद पर कैसे मैं रेतु
काल ना है अब तुमसे बाजी लेने को
एक सांस भी नहीं है व्यर्थ जाने को
है राह सबके लिए , इस राह पर काटें ना बोओ
दो चार दिन सुख के लिए इंसानियत अपनी ना खोओ
पाषाण पर बोया गया पौधा कभी फलता नहीं..
सूरज अगर ढलता नहीं तो पूरब उसे मिलता कोई ?
न्याय गया, निष्ठां गयी, बदल गया है वक़्त वो..
अब तो सब भगवान् हैं , रहा ना कोई भक्त तो
अपने सुख के लिए सभी दुखी यहाँ दिन रात वो
सुखियों को भी सुख नहीं दुखियों की क्या बात हो ??..

Beautiful creation sir
ReplyDeleteBeautiful creation sir
ReplyDeleteThnx Vivek for your precious words..
ReplyDeleteThis comment has been removed by the author.
ReplyDelete