
मन को अविरल बहने दो
मन को अविरल बहने दो
झील की चोटिल लहरों से निदिस्त पवन से लरने दो
अपार प्राकृतिक विकल्पों सी
परमार्थ प्रासंगिक दुनिया में सब मुक्ति से रहने दो
पथरीली संमर्गों पर दिशा मलिन कुछ अनजानी सी
विक्षिप्त आंशिक बाधाओं को विलीन वही हो जाने दो
अनल की तेज,प्रखर छाया सी
मन को अविरल बहने दो
काल्पनिक सपनो की भवसागर सी
साकार सब हो जाने दो
प्रत्यक्ष मिलन की अभेद छितिज सी
पर्याय विधित हो जाने दो
विरह की करुण निरमं व्यथा सी
वैदिक वाणी सत्य हो जाने दो
इश्वरिये अभिन्न इश दुनिया सी
प्रभुत्व बोध मिट जाने दो
मातृत्व समन्वय आँचल सी
मन को अविरल बहने दो
विनीत शिशु की मनोहारी किलकारी सी
उन्मादित जग हो जाने दो
रेगिस्ता की शुष्क पवन सी
विहर विराने मन में भी स्नेह सलिल भर जाने दो....
No comments:
Post a Comment