ये किस उलझन में पर गया हूँ
जैसे अपने ही समाधी पे चढ़ गया हूँ
क्या करू कोई ओर समझ नहीं आता है
जिसे समझाना चाह अब वो दूर तक नज़र नहीं आता है
नदी की धार की तरह बह रहा हूँ
कोई मांझी भी नहीं है साथ जो बन सके मेरे डूबती नईया की आस
किसे समझू कहाँ तक जाऊ क्यूँ मैं घबराऊ डरकर जीने की आदत कैसे बनाऊ
भवर में फसा था तो दर था डूब का डगर पे खरा हु तो दर है खो जाने का
दो राहे जो सामने है सब एक ही से नज़र आते हैं
जिस ओर देखता हूँ जग उठती है अपनों से मिलने की आस
पर कदम जब आगे बढ़ता हूँ तो डगमगा जाता है विश्वास
अफ़सोस नहीं मुझे अपने इश हाल पर
अलबत्ता ख़ुशी है बंदिसो के दीवार को तोर जाने पर
भवर थी डगर थी वो जैसी भी पहर थी
मगर मैं कहूँगा वो बीती हुए असहनीय कहर थी
बहुत मुश्किल से जीवन रुपी गाड़ी को पटरी पर चढ़ाया है
क्यूंकि कहीं न कहीं इसी में तुम्हारी काया है ।
जैसे अपने ही समाधी पे चढ़ गया हूँ
क्या करू कोई ओर समझ नहीं आता है
जिसे समझाना चाह अब वो दूर तक नज़र नहीं आता है
नदी की धार की तरह बह रहा हूँ
कोई मांझी भी नहीं है साथ जो बन सके मेरे डूबती नईया की आस
किसे समझू कहाँ तक जाऊ क्यूँ मैं घबराऊ डरकर जीने की आदत कैसे बनाऊ
भवर में फसा था तो दर था डूब का डगर पे खरा हु तो दर है खो जाने का
दो राहे जो सामने है सब एक ही से नज़र आते हैं
जिस ओर देखता हूँ जग उठती है अपनों से मिलने की आस
पर कदम जब आगे बढ़ता हूँ तो डगमगा जाता है विश्वास
अफ़सोस नहीं मुझे अपने इश हाल पर
अलबत्ता ख़ुशी है बंदिसो के दीवार को तोर जाने पर
भवर थी डगर थी वो जैसी भी पहर थी
मगर मैं कहूँगा वो बीती हुए असहनीय कहर थी
बहुत मुश्किल से जीवन रुपी गाड़ी को पटरी पर चढ़ाया है
क्यूंकि कहीं न कहीं इसी में तुम्हारी काया है ।
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